ज्ञान परम लक्ष्य की प्रथम सीड़ी से अधिक कुछ भी नही .... ज्ञान रुपी धतूरे का मद जब चढ़ता है तब व्यक्ति स्वयं को ही स्मरण रखता है , उसे अपने समक्ष सभी छोटे और व्यर्थ प्रतीत होते है ... इस ज्ञान रूपी धतूरे का सेवन जितना अधिक होता है व्यक्ति अहंकार के मद में पागल हुआ उचित अनुचित के निर्णय की क्षमता को खो बैठता है ...नेत्र बन्द हो जाते हैं और अहंकार को वाणी मिल जाती है .... मैं ही हूँ ... सर्वस्व मैं ही हूँ .....
ऐसे मद की काट प्रेम और मात्र प्रेम है ..... जब अपने इष्ट से प्रेम होने लगे , तब यह मैं का मद उतर जाता है जब प्रेम की मदिरा का मद चढ़ता है तो हर मद टूट के बिखरने लगता है ....
सबसे पहले मुझे मुझ ही से विस्मृत करता है ... जिसमे प्राणी स्वयम् को भूलकर अपने प्रेमी का ही निरंतर चिंतन करे तो ऐसा महामद भक्ति बनकर निरन्तर उसके चिंतन , मनन में ही मन बुद्धि से विचरण करता चला जता है ......
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ॐ जय श्री कृष्ण हरे !!! 

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